सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्यारी गौरैया । Pyari Goraiya | sahitya samudram kavita


प्यारी गौरैया मेरी पहली कविता है जो गौरैया की कहनी के रूप में है।
Pyari Goraiya kavita sahitya samudram

कभी पेड़ों पर चहकती थी
कभी आंगन में फूदकती थी !
सिर्फ यादो के झरोखो से 
मधुर संगीत सुनती थी!!

अब तो प्यारी वो यादें हैं
जो बस अवशेष रह गयी है!
ना वो मुंडेर रह गया है 
ना वो आंगन रह गयी है !!

माँ ने गुड़िया को सुनायी 
एक गोरैये की कहानी है!
केसी होती है गोरैयाँ 
जो गाती गीत सुहानी है!

गुड़िया मुस्काकर बोली
माँ गोरैयाँ तो दिखलाओ!!
कहानी की जो वास्तविकता है 
उसको तुम बतलाओ!!

गुड़िया के प्रश्नो पर 
माँ का दर्द छलक आया!
माँ ने गुड़िया को खेतों में
लगा टावर है दिखलाया!!

बेठा है इसमे एक
वो कृतिम दरिंदा !
जिसने छिना है हमसे 
हमारा प्यारा परिंदा!!

अगर गौरेये को बचना है !
तो इस दरिंदे को मिटाना है !!
वरना केवल कहानी में 
रह जाएगीं ये गौरेया!

तब गुड़िया की सवालो का
केसे उत्तर देगी ये दुनिया!!

कभी पेड़ों पर चहकती थी
कभी आंगन में फूदकती थी !
सिर्फ यादो के झरोखो से
मधुर संगीत सुनती थी!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गीतांजलि रवीन्द्रनाथ ठाकुर 

गीतांजलि  रवीन्द्रनाथ ठाकुर  अनुवाद डॉ. डोमन साहु 'समीर' मेरा माथा नत कर दो तुम (आमार माथा नत क’रे दाव तोमार चरण धूलार त’ ले) मेरा माथा नत कर दो तुम अपनी चरण-धूलि-तल में; मेरा सारा अहंकार दो डुबो-चक्षुओं के जल में। गौरव-मंडित होने में नित मैंने निज अपमान किया है; घिरा रहा अपने में केवल मैं तो अविरल पल-पल में। मेरा सारा अहंकार दो डुबो चक्षुओं के जल में।। अपना करूँ प्रचार नहीं मैं, खुद अपने ही कर्मों से; करो पूर्ण तुम अपनी इच्छा मेरी जीवन-चर्या से। चाहूँ तुमसे चरम शान्ति मैं, परम कान्ति निज प्राणों में; रखे आड़ में मुझको आओ, हृदय-पद्म-दल में। मेरा सारा अहंकार दो। डुबो चक्षुओं के जल में।। विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी (आमि बहु वासनाय प्राणपणे चाइ...) विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी; संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में। अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको, आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे, बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही, अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके। ...

परमात्मा का कुत्ता - मोहन राकेश / parmatma ka kutta | साहित्य समुद्रम

परमात्मा का कुत्ता मोहन राकेश जी की कहानियों में से एक है। परमात्मा का कुत्ता मोहन राकेश बहुत-से लोग यहाँ-वहाँ सिर लटकाए बैठे थे जैसे किसी का मातम करने आए हों। कुछ लोग अपनी पोटलियाँ खोलकर खाना खा रहे थे। दो-एक व्यक्ति पगडिय़ाँ सिर के नीचे रखकर कम्पाउंड के बाहर सडक़ के किनारे बिखर गये थे। छोले-कुलचे वाले का रोज़गार गरम था, और कमेटी के नल के पास एक छोटा-मोटा क्यू लगा था। नल के पास कुर्सी डालकर बैठा अर्ज़ीनवीस धड़ाधड़ अर्ज़ियाँ टाइप कर रहा था। उसके माथे से बहकर पसीना उसके होंठों पर आ रहा था, लेकिन उसे पोंछने की फुरसत नहीं थी। सफ़ेद दाढिय़ों वाले दो-तीन लम्बे-ऊँचे जाट, अपनी लाठियों पर झुके हुए, उसके खाली होने का इन्तज़ार कर रहे थे। धूप से बचने के लिए अर्ज़ीनवीस ने जो टाट का परदा लगा रखा था, वह हवा से उड़ा जा रहा था। थोड़ी दूर मोढ़े पर बैठा उसका लडक़ा अँग्रेज़ी प्राइमर को रट्‌टा लगा रहा था-सी ए टी कैट-कैट माने बिल्ली; बी ए टी बैट-बैट माने बल्ला; एफ ए टी फैट-फैट माने मोटा...। कमीज़ों के आधे बटन खोले और बगल में फ़ाइलें दबाए कुछ बाबू एक-दूसरे से छेडख़ानी करते, रजिस्ट्रेशन ब्रांच से रिकार्ड ब...

आदमी का बच्चा यशपाल

आदमी का बच्चा यशपाल दो पहर तक डौली कान्वेंट (अंग्रेज़ी स्कूल) में रहती है। इसके बाद उसका समय प्रायः पाया ‘बिंदी’ के साथ कटता है। मामा दोपहर में लंच के लिए साहब की प्रतीक्षा करती है। साहब जल्दी में रहते हैं। ठीक एक बजकर सात मिनट पर आये, गुसलखाने में हाथ-मुंह धोया, इतने में मेज पर खाना आ जाता है। आधे घंटे में खाना समाप्त कर, सिगार सुलगा साहब कार में मिल लौट जाते हैं। लंच के समय डौली खाने के कमरे में नहीं आती, अलग खाती है। संध्या साढ़े पांच बजे साहब मिल से लौटते हैं तो बेफिक्र रहते हैं। उस समय वे डौली को अवश्य याद करते हैं। पांच-सात मिनट उससे बात करते हैं और फिर मामा से बातचीत करते हुए देर तक चाय पर बैठे रहते हैं। मामा दोपहर या तीसरे पहर कहीं बाहर जाती हैं तो ठीक पांच बजे लौट कर साहब के लिए कार मिल में भेज देती हैं। डौली को बुला साहब के मुआयने के लिए तैयार कर लेती हैं। हाथ-मुंह धुलवा कर डौली की सुनहलापन लिये, काली-कत्थई अलकों में वे अपने सामने कंघी कराती हैं। स्कूल की वर्दी की काली-सफेद फ्रॉक उतारकर, दोपहर में जो मामूली फ्रॉक पहना दी जाती है उसे बदल नयी बढ़िया फ्राक उसे प...