हिमकिरीटिनी माखनलाल चतुर्वेदी 1. नव स्वागत तुम बढ़ते ही चले, मृदुलतर जीवन की घड़ियाँ भूले, काठ छेदने लगे, सहस दल की नव पंखड़ियाँ भूले; मन्द पवन संदेश दे रहा, ह्रदय-कली पथ हेर रही, उड़ो मधुप ! नन्दन की दिशि में ज्वालाएं घर घेर रहीं; तरुण तपस्वी ! आ, तेरा कुटिया में नव स्वागत होगा, दोषी तेरे चरणों पर, फिर मेरा मस्तक नत होगा । (1923) 2. घर मेरा है क्या कहा कि यह घर मेरा है? जिसके रवि उगें जेलों में, संध्या होवे वीरानों मे, उसके कानों में क्यों कहने आते हो? यह घर मेरा है? है नील चंदोवा तना कि झूमर झालर उसमें चमक रहे, क्यों घर की याद दिलाते हो, तब सारा रैन-बसेरा है? जब चाँद मुझे नहलाता है, सूरज रोशनी पिन्हाता है, क्यों दीपक लेकर कहते हो, यह तेरा है, यह मेरा है? ये आए बादल घूम उठे, ये हवा के झोंके झूम उठे, बिजली की चमचम पर चढ़कर गीले मोती भू चूम उठे; फिर सनसनाट का ठाठ बना, आ गई हवा, कजली गाने, आ गई रात, सौगात लिए, ये गुलसब्बो मासूम उठे। इतने में कोयल बोल उठी, अपनी तो दुनिया डोल उठी, यह अंधकार का तरल प्यार सिसकें बन आयीं जब मलार; मत घर क...
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