मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी 1. आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक दाम हर मौज में है हलका-ए-सदकामे-नहंग देखें क्या गुज़रे है कतरे पे गुहर होने तक आशिकी सबर तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूं ख़ूने-जिगर होने तक हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक परतवे-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम मैं भी हूं एक इनायत की नज़र होने तक यक-नज़र बेश नहीं फुरसते-हसती गाफ़िल गरमी-ए-बज़म है इक रकसे-शरर होने तक ग़मे-हसती का 'असद' किस से हो जुज़ मरग इलाज शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक 2. बस कि दुशवार है हर काम का आसां होना बस कि दुशवार है हर काम का आसां होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना गिरीया चाहे है खराबी मिरे काशाने की दरो-दीवार से टपके है बयाबां होना वाए दीवानगी-ए-शौक कि हरदम मुझको आप जाना उधर और आप ही हैरां होना जलवा अज़-बसकि तकाज़ा-ए-निगह करता है जौहरे-आईना भी चाहे है मिज़गां होना इशरते-कतलगहे-अहले-तमन्ना मत पूछ ईदे-नज़्ज़ारा है शमशीर का उरीयां होना ले गए ख़...
सहित्य समुद्रम हिन्दी की प्रसिद्ध कविताओं व कहानियों का संग्रह करने के उद्देश्य से बनाई गई एक अव्यवसायिक विकि साइट हैं।