पदावली संत मीरा बाई (भाग-1) 1. अखयाँ तरसा दरसण प्यासी अखयाँ तरसा दरसण प्यासी।।टेक।। मग जोवाँ दिण बीताँ सजणी, णैण पड्या दुखरासी। डारा बेठ्या कोयल बोल्या, बोल सुण्या री गासी। कड़वा बोल लोक जग बोल्या करस्याँ म्हारी हांसी। मीरां हरि रे हाथ दिकाणी जणम जणम री दासी।। (तरसा=तरस रही है, दुखरासी=दुःखों का ढेर, अत्यधिक दुःख, डारा=डाली, गासी=दुःख से भरा हुआ) 2. अच्छे मीठे फल चाख चाख अच्छे मीठे फल चाख चाख, बेर लाई भीलणी। ऐसी कहा अचारवती, रूप नहीं एक रती। नीचे कुल ओछी जात, अति ही कुचीलणी। जूठे फल लीन्हे राम, प्रेम की प्रतीत त्राण। उँच नीच जाने नहीं, रस की रसीलणी। ऐसी कहा वेद पढी, छिन में विमाण चढी। हरि जू सू बाँध्यो हेत, बैकुण्ठ में झूलणी। दास मीरा तरै सोई, ऐसी प्रीति करै जोइ। पतित पावन प्रभु, गोकुल अहीरणी। (अचारवती=अचार-विचार से रहने वाली, एक रती = रत्ती भर भी, कुचीलणी=मैले-कुचैले वस्त्रों वाली, प्रतीति=विश्वास, रस की रसीलणी= भक्ति-प्रेम-रस की रसिकता, छिन में विमाण चढ़ी= मोक्ष पा गई,स्वर्ग चली गई, हेत=प्यार,प्रेम, गोकुल अहीरणी=गोकुल की ग्वालिन;पूर्व ज...