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गुलजार की नज़्म मेरे साथ बैठकर

मेरे साथ बैठकर...

मेरे साथ बैठकर
ये नज़्म रोज़ शाम को, शराब पीती है
मैं तो सिर्फ़ एक-दो ही जाम उतार लेता हूं
ये नज़्म रात देर तक सुराही के गले से
लगके बैठी रहती है!

इसको तो कभी चढ़ी नहीं मगर
मुझको नज़्म कितने रोज़ तक उतरती ही नहीं!!

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