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नीरजा महादेवी वर्मा

नीरज  महादेवी वर्मा 1. प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर! दुख से आविल सुख से पंकिल, बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल, बहता है युग-युग अधीर! जीवन-पथ का दुर्गमतम तल अपनी गति से कर सजल सरल, शीतल करता युग तृषित तीर! इसमें उपजा यह नीरज सित, कोमल कोमल लज्जित मीलित; सौरभ सी लेकर मधुर पीर! इसमें न पंक का चिन्ह शेष, इसमें न ठहरता सलिल-लेश, इसको न जगाती मधुप-भीर! तेरे करुणा-कण से विलसित, हो तेरी चितवन में विकसित, छू तेरी श्वासों का समीर! 2. धीरे धीरे उतर क्षितिज से धीरे धीरे उतर क्षितिज से आ वसन्त-रजनी! तारकमय नव वेणीबन्धन शीश-फूल कर शशि का नूतन, रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन, मुक्ताहल अभिराम बिछा दे चितवन से अपनी! पुलकती आ वसन्त-रजनी! मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि, अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि, भर पद-गति में अलस तरंगिणि, तरल रजत की धार बहा दे मृदु स्मित से सजनी! विहँसती आ वसन्त-रजनी! पुलकित स्वप्नों की रोमावलि, कर में ही स्मृतियों की अंजलि, मलयानिल का चल दुकूल अलि! चिर छाया-सी श्याम, विश्व को आ अभिसार बनी! सकुचती आ वसन्त-रजनी! सिहर सिहर उठता सरिता-...