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मेरी इक्यावन कविताएँ अटल बिहारी वाजपेयी

मेरी इक्यावन कविताएँ  अटल बिहारी वाजपेयी अनुभूति के स्वर 1. आओ फिर से दिया जलाएँ आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ हम पड़ाव को समझे मंज़िल लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल वतर्मान के मोहजाल में- आने वाला कल न भुलाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ। आहुति बाकी यज्ञ अधूरा अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज़्र बनाने- नव दधीचि हड्डियां गलाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ 2. हरी हरी दूब पर हरी हरी दूब पर ओस की बूंदे अभी थी, अभी नहीं हैं। ऐसी खुशियाँ जो हमेशा हमारा साथ दें कभी नहीं थी, कहीं नहीं हैं। क्काँयर की कोख से फूटा बाल सूर्य, जब पूरब की गोद में पाँव फैलाने लगा, तो मेरी बगीची का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ या उसके ताप से भाप बनी, ओस की बुँदों को ढूंढूँ? सूर्य एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर ओस भी तो एक सच्चाई है यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ? कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ? सूर्...

तार सप्तक गजानन माधव मुक्तिबोध

तार सप्तक गजानन माधव मुक्तिबोध 1. आत्मा के मित्र मेरे वह मित्र का मुख ज्यों अतल आत्मा क्यारी बन गयी साक्षात् निज सुख । वह मधुरतम हास जैसे आत्म-परिचय सामने ही आ रहा है मूर्त हो कर । जो सदा ही मम हृदय-अन्तर्गत छिपे थे वे सभी आलोक खुलते जिस सुमुख पर ! वह हमारा मित्र है, आत्मीयता के केन्द्र पर एकत्र सौरभ ! वह बना मेरे हृदय का चित्र है ! जो हृदय-सागर युगों से लहरता, आनन्द में व्याकुल चला आता कि नीला गोल क्षण-क्षण गूंजता है, उस जलधि की श्याम लहरों पर जुड़ा आता सघनतम श्वेत, स्वर्गिक फेन, चंचल फेन ! जिस को नित लगाने निज मुखों पर स्वप्न की मृदु मूर्तियों-सी अप्सराएँ सांझ-प्रात: मृदु हवा की लहर पर से सिन्धु पर रख अरुण तलुए उतर आतीं, कान्तिमय नव हास ले कर । उस जलधि की युग-युगों की अमल लहरों पर जुड़ा जो फेन, अन्तर के अतल हिल्लोल का जो बाह्य है सौन्दर्य- कोमल फेन । जिस के आत्म-मन्दिर में समर्पित, दु:ख-सुखों की साँझ-प्रात: जो अकेला याद आता मुख हमें नित ! काल की, परिवर्तनों की तीव्र धारा में बहा जाता मधुरतम साथ जिस का, प्राण की उत्थान-गति की तीव्रता में बह रहा उ...